Saturday, April 5, 2025
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असम विधानसभा में नमाज ब्रेक खत्म: 90 साल पुरानी परंपरा का अंत!

असम विधानसभा में नमाज ब्रेक खत्म: 90 साल पुरानी परंपरा का अंत, सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया ऐतिहासिक फैसला

असम विधानसभा में 90 साल पुरानी परंपरा को खत्म करते हुए मुस्लिम विधायकों को मिलने वाले शुक्रवार के नमाज ब्रेक को रद्द कर दिया गया है। इस ऐतिहासिक निर्णय को बजट सत्र से लागू किया गया, जिसे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक सकारात्मक कदम बताया।

90 साल पुरानी परंपरा का अंत

असम विधानसभा में अब तक मुस्लिम विधायकों को शुक्रवार की नमाज अदा करने के लिए दो घंटे का विशेष अवकाश दिया जाता था। यह परंपरा 1937 में मुस्लिम लीग नेता सैयद सादुल्ला के कार्यकाल में शुरू की गई थी। लेकिन अब सदन ने इसे समाप्त कर दिया है, जिससे सभी विधायकों को बिना किसी रुकावट के सदन की कार्यवाही में भाग लेने का अवसर मिलेगा।

विपक्ष ने जताई आपत्ति

इस फैसले पर विपक्षी दलों ने असंतोष व्यक्त किया। AIUDF विधायक रफीकुल इस्लाम ने इसे “संख्या के आधार पर थोपा गया फैसला” बताया। उन्होंने कहा, “विधानसभा में लगभग 30 मुस्लिम विधायक हैं, और हमने इस फैसले का विरोध किया था, लेकिन भाजपा बहुमत का उपयोग कर इसे लागू कर रही है।”

कांग्रेस नेता देबब्रत सैकिया ने कहा कि नमाज अदा करने के लिए पास में ही प्रावधान किया जा सकता था। उन्होंने कहा, “मेरे कई पार्टी सहयोगी और AIUDF विधायक महत्वपूर्ण सत्र से चूक गए क्योंकि वे नमाज अदा करने गए थे। शुक्रवार की विशेष प्रार्थना को ध्यान में रखते हुए कोई वैकल्पिक व्यवस्था हो सकती थी।”

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सीएम हिमंत बिस्वा सरमा का बड़ा बयान

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह उत्पादकता को बढ़ाने और औपनिवेशिक काल की परंपराओं को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा, “यह मुस्लिम लीग द्वारा लागू की गई एक पुरानी परंपरा थी, जिसे अब समाप्त कर दिया गया है। असम विधानसभा को किसी अन्य दिन की तरह शुक्रवार को भी सुचारू रूप से कार्य करना चाहिए।”

कैसे बदलेगा सदन का कामकाज?

इस निर्णय से अब शुक्रवार को सदन की कार्यवाही बिना किसी रुकावट के चल सकेगी। इससे विधायकों को सभी महत्वपूर्ण चर्चाओं और नीतिगत फैसलों में भाग लेने का अवसर मिलेगा।

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निष्कर्ष

असम विधानसभा में नमाज ब्रेक समाप्त करने का फैसला ऐतिहासिक है। यह निर्णय संविधान की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति और सदन की कार्यप्रणाली को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। हालांकि, विपक्ष इस फैसले पर असंतोष जता रहा है, लेकिन सरकार इसे ‘उत्पादकता बढ़ाने और औपनिवेशिक परंपराओं को समाप्त करने’ का एक अहम कदम मान रही है।

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